Munish ki awaaz ka andaz hi kuch aur hai. Vakai sundar prastuti hai, dono hi log mubarakbaad kuboool farmain. Kabhi mauka lage to Manoharshyam Joshi ke novel Kasap par bhi nazar maarain. Khaaskar page no. 166 (yaad se) par jahan nayak DD Almora shahar ko lanat de raha hai.
Wah bhai ji ,rachanadharmita ka na koi chora hai na koi seema ,ekdum nisseem hai yah to.Aap ko dhanyad ke shabd ,kum hai aabhar theek rahega.Socha bhi na thaa ki blog aisa bhi ho sakta hai ,maza aagaya ,jai ho kahna hi parega, sneh,dhanyavaad aapka hi dr.bhoopendra
पिछले दिनों मैंने स्वयं प्रकाश की यह कहानी आपसे माँगी थी. हमारे ब्लॉगर साथी मोहन वशिष्ठ ने इसे मुझे मुहैया कराया है. उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए यह कहानी उन्हें ही सादर भेंट की जाती है. कोई दस साल पहले जब सहमत ने सांप्रदायिकता विषयक कहानियों का एक संग्रह छापा तभी इस कहानी पर मेरी नज़र गई थी. इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद मचे क़त्ल-ए-आम की यह दस्तावेज़ी कहानी है. कई मायनों में यह एक समकालीन कहानी, मानवता के संकटों को सामने लाती है। Part-1 10 min approx Part-2 10 Min approx स्वर इरफ़ान का है और साथ में हमारे साथी मुनीश इसे कई जगहों पर प्रभावकारी बना रहे हैं। अवधि लगभग बीस मिनट.
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sneh,dhanyavaad
aapka hi
dr.bhoopendra