Thursday, May 22, 2008

किताब पढकर रोना

रोया हूं मैं भी किताब पढकर के
पर अब याद नहीं कौन-सी
शायद वह कोई वृत्तांत था
पात्र जिसके अनेक
बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते थे
पढता जाता और रोता जाता था मैं
क्षण भर में सहसा पहचाना
यह पढ्ता कुछ और हूं
रोता कुछ और हूं
दोनों जुड गये हैं पढना किताब का
और रोना मेरे व्यक्ति का

लेकिन मैने जो पढा था
उसे नहीं रोया था
पढने ने तो मुझमें रोने का बल दिया
दुख मैने पाया था बाहर किताब के जीवन से

पढ्ता जाता और रोता जाता था मैं
जो पढ्ता हूं उस पर मैं नही रोता हूं
बाहर किताब के जीवन से पाता हूं
रोने का कारण मैं
पर किताब रोना संभव बनाती है.





रघुवीर सहाय

आवाज़: इरफ़ान
........अवधि: लगभग डेढ मिनट

3 comments:

Vijendra S. Vij said...

Kavita auir Aawaj dono me kashish hai ek khichav...behad umda abhivkyktii/

Geet Chaturvedi said...

अद्भुत कविता. सुंदर पाठ.

अच्‍छा है आपका ये ब्‍लॉग. बधाई.

sanjay patel said...

कविता में पोशीदा ख़्याल को स्वर ही उघाड़ता है.
वह इस पाठ में भी हुआ है इरफ़ान भाई.