Saturday, May 24, 2008

जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे!


आर्ट ऑफ़ रीडिंग का आप की तरफ़ से जो स्वागत हुआ है उसके लिये हम आपके आभारी हैं।
आज सुनिये विनोद कुमार शुक्ल की कविता "जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे". आवाज़ अतुल आर्य की है जिन्हें आप द नेशनल ज्योग्राफ़िक चैनेल, द हिस्ट्री चैनल और द डिस्कवरी चैनेल पर सुनते हुए ख़ूब पहचानते हैं.

फ़ोटो सौजन्य: निर्मल-आनंद

4 comments:

vijay gaur said...

kavita bhi hai khoob aur path bhi utna hi sundar. aapka ye blog nichit hi vishist hai. kuch ese hi apne apne andajo ke blog ho to pathak shrota dundte hue pahuchenge hi. badhai aur shubhkamanai irfan bhai.

डॉ दुर्गाप्रसाद अग्रवाल said...

कहना मुश्किल है कि कविता अधिक अर्थपूर्ण है या उसका पाठ. इस शानदार काम के लिए बधाई. सिलसिला बनाये रखें. और हां, अगर यह सुविधा भी हो जाए कि हम इसे डाउनलोड कर सकें तो क्या कहने!

Dr. Chandra Kumar Jain said...

विनोदकुमार शुक्ल जी का जन्म
मेरे शहर राजनांदगाँव में ही हुआ था....
बहरहाल वे रायपुर में रहते हैं.
बरबस खिंचा चला आया इस पोस्ट की तरफ़
एक ज़रूरी काम की तरह !
आपका आभार=====================
डा.चंद्रकुमार जैन

Satish Yadav said...

आवाज के साथ कविता में और ज्यादा रस आ गया है, बहुत खूब ।