Thursday, May 22, 2008

काकी


हमारा साहित्य कई कालजयी रचनाओं से भरा पडा है. मानवता की करुण दास्तानें और उनकी निर्दोष अभिव्यक्तियों की बानगियाँ चप्पे-चप्पे पर दर्ज हैं. रेडियो रेड समय-समय पर इन्हीं रचनाओं का महत्व और उत्सव रेखांकित करता रहता है. इसी क्रम में आज पेश है सियारामशरण गुप्त की शॉर्ट स्टोरी काकी. आवाज़ है हमारी सहकर्मी राखी की.


अवधि: लगभग 5 मिनट

3 comments:

नितिन व्यास said...

उम्दा प्रस्तुति!

Satish Yadav said...

बचपन में पाठ्यपुस्तकों में ये कहानी पढी थी, आज सुनकर बहुत अच्छा लगा।

Mala Telang said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति... । कहानी सुनते हुये रोंगटे खड़े हो गये ..... बहुत बढ़िया...। आती रहूंगी ....