वाह भाई, मुनीश भाई के स्वर में मंटों जी का धुआं सुनना बहुत अच्छा लगा । धुंआ की यादें ताजा हो गई , मंटों जी के बाल मनोविज्ञान पर लिखी यह कहानी लाजवाब है ।
Shows human mind in eternal and complex way, nice story n nice reading.
Anonymous said…
bhai aapka blog sunoon kaise? kahan click karoon? kya download karoon? Manto ka afsana boo sun ne ka bhagirathee prayaas ab tak koi rang na la saka hai.
पिछले दिनों मैंने स्वयं प्रकाश की यह कहानी आपसे माँगी थी. हमारे ब्लॉगर साथी मोहन वशिष्ठ ने इसे मुझे मुहैया कराया है. उनके प्रति आभार व्यक्त करते हुए यह कहानी उन्हें ही सादर भेंट की जाती है. कोई दस साल पहले जब सहमत ने सांप्रदायिकता विषयक कहानियों का एक संग्रह छापा तभी इस कहानी पर मेरी नज़र गई थी. इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद मचे क़त्ल-ए-आम की यह दस्तावेज़ी कहानी है. कई मायनों में यह एक समकालीन कहानी, मानवता के संकटों को सामने लाती है। Part-1 10 min approx Part-2 10 Min approx स्वर इरफ़ान का है और साथ में हमारे साथी मुनीश इसे कई जगहों पर प्रभावकारी बना रहे हैं। अवधि लगभग बीस मिनट.
आर्ट ऑफ़ रीडिंग में वादे के मुताबिक़ हम हाज़िर हैं अपनी इतवार की ख़ास पेशकश के साथ. हमने नज़र दौडाते हुए शायदा के ब्लॉग पर मौजूद उनकी पहली पोस्ट को चुना है. इस पोस्ट को आप मातील्दा नाम के ब्लॉग पर पहले पढ चुके हैं और सराह भी चुके हैं. अब लीजिये इरफ़ान की आवाज़ में इस पोस्ट को सुनिये और अगले इतवार का इंतज़ार कीजिये, जब आपकी भी कोई पोस्ट यहाँ पढी जा रही होगी. अवधि कोई साढे तीन मिनट है. डाउनलोड करके सुनने के लिये लिंक यहाँ है। एक घर, जो हवा में तैरता है
आपको यह जानकर शायद अच्छा लगे कि आर्ट ऑफ़ रीडिंग में हम एक नया फ़ीचर जोडने जा रहे हैं. हमने यह ब्लॉग बनाया ही इसलिये है कि आप छपे हुए शब्दों की ध्वन्यात्मक सुंदरता से दो चार हो सकें. इस दिशा में हम अपनी कारोबारी व्यस्तताओं और प्रोडक्शंस के थकाऊ चक्करों के बीच अपने मन की तरंग का काम उसी तरह करते रहेंगे जैसा आप अभी तक देखते-सुनते आए हैं. हमें अपनी साहित्यिक धरोहर के अनमोल मोतियों से दिली लगाव है और नितांत निजी कारणों और रुचियों से हम इस ख़ज़ाने के मोती आपके सामने रखते रहेंगे. संयोग से ये आपको भी अच्छे लगेंगे तो हम समझेंगे कि "हमारी और आपकी राय कितनी मिलती-जुलती है!" हाँ तो मैं एक नये फ़ीचर की बात कर रहा था. दरअस्ल ये नया फ़ीचर हमारे आपके प्यारे क़िस्सागो मुनीश मयख़ानवी के दिमाग़ की उपज है. हम दोनो एक दोपहर पीपल के एक पेड के नीचे सिगरेट से धुआँ उडाते हुए इस बात पर सहमत हुए कि यार लोग इतनी अच्छी-अच्छी पोस्टें अपने-अपने ब्लॉग्स पर लिखते हैं लेकिन कई बार ब्लॉग परिवार में मची हलचलों या ऐसे ही कुछ नामाक़ूल कारणों से वो पोस्टें इतनी तवज्जो नहीं हासिल कर पातीं, जिनकी वो हक़दार होती हैं, तो ...
Comments
allahabadwala@yahoo.com