अमृता प्रीतम हर किसी की ज़िंदगी के एक मोड पर कहीं न कहीं शामिल होती हैं और कुछ अनचीन्हा सा छोड जाती हैं या कहें जोड जाती हैं. पेश करता हूँ "रसीदी टिकट" से एक हिस्सा. Voice and presentation: Irfan Dur: 10 Min Approx
रोया हूं मैं भी किताब पढकर के पर अब याद नहीं कौन-सी शायद वह कोई वृत्तांत था पात्र जिसके अनेक बनते थे चारों तरफ से मंडराते हुए आते थे पढता जाता और रोता जाता था मैं क्षण भर में सहसा पहचाना यह पढ्ता कुछ और हूं रोता कुछ और हूं दोनों जुड गये हैं पढना किताब का और रोना मेरे व्यक्ति का लेकिन मैने जो पढा था उसे नहीं रोया था पढने ने तो मुझमें रोने का बल दिया दुख मैने पाया था बाहर किताब के जीवन से पढ्ता जाता और रोता जाता था मैं जो पढ्ता हूं उस पर मैं नही रोता हूं बाहर किताब के जीवन से पाता हूं रोने का कारण मैं पर किताब रोना संभव बनाती है. रघुवीर सहाय आवाज़ : इरफ़ान ........ अवधि : लगभग डेढ मिनट
मंटो की कहानियाँ मेहनतकश जनता के मनोजगत का दस्तावेज़ भी हैं. सुनिये नंगी आवाज़ें और महसूस कीजिये उस मानवीय करुणा का ताप, जिसे बाहर रहकर पेश कर पाना बडे जिगरे का काम है. शुरुआत में आवाज़ें अरशद इक़बाल और मुनीश की हैं. क़िस्सागो : इरफ़ान Duration: 20 Min.