सन्डे स्पेशल में आज सुनिए ; हारमोनियम
पिछले संडे हम हाज़िर न हो सके तो उसकी वजह महज़ वो बदमज़गी नहीं थी जो कुछ वरिष्ठ और बेहद गरिष्ठ ख़ानसामों ने पैदा की थी, और न ही वो एक्सीडेंट जिसमें मैं मर भी न सका, न तो ये कि भाई मुनीश शनीचर की शाम घंटों मुझे आवाज़ देते रहे और मैं कान में रुई डाले पडा रहा, न ये कि हमारे ब्रॉडबैंडवालों ने हमें ब्लॉगिंग से वंचित रखने की कामयाब कोशिश की, और न तो ये हम आपके रिस्पॉंसेज़ से संतुष्ट नहीं हैं. असल में घुमक्कडी की पुरानी हूक हमें सोहना के पास एक खूबसूरत पहाडी झरने तक ले गई जहाँ हम मौसमी बहारों का लुत्फ़ लेने में इतने मुलव्विस थे कि हमें अपने वादे तक की याद न रही. फिर सोने में सुहागा ये कि वहाँ हम निशा मधूलिका के सिखाए पालक के पकौडों का ज़ायक़ा लेते रहे. हालाँकि हमारे मोबाइल ऑन थे और संडे स्पेशल के मद्दाहों के एसएमएस भी आते रहे जिन्हें हम बेदर्दी से डीलिट करते रहे. आख़िर हम अपने मन की तरंग के लिये ही तो ये अगडम-बगडम पोस्टें पब्लिश करते रहते हैं! सच कहें इस दौरान हमें ब्लॉगिंग से दूर रहने का कोई मलाल तो दूर ज़रूरत भी नहीं रही. ये ज़रूर हुआ कि इन्हीं एसएमएसेज़ में से एक में हमें नौकरी से निकाल देने की धमकी ...