Friday, July 25, 2008

संडे स्पेशल: आज सुनिये लपूझन्ने का बचपन और कर्नल रंजीत


मैंने पहले भी कहा है कि लपूझन्ना मेरा पसंदीदा ब्लॉग है. इसमें न तो कोई मुझसे सफ़ाई माँग सकता है और न ही यह आरोप लगा सकता है कि हम अपनी यारी निभाते हुए ये भूल रहे हैं कि इस पोस्ट से भी अच्छी कई पोस्टें हैं जो इस पर भारी हैं और हम संडे स्पेशल में उन्हें नज़र अंदाज़ कर रहे हैं. अब तो हम इन बातों पर कान भी नहीं देते क्योंकि आख़िरकार आर्ट ऑफ़ रीडिंग हमारे मन की तरंग है और इसमें हम अपने वक़्त और पूँजी का ख़ासा ख़सारा कर रहे हैं.
पिछले हफ़्ते हमें अपनी व्यस्तताएँ ज़्यादा प्यारी रहीं क्योंकि हमें अपने बिल भी तो चुकाने होते हैं।

कर्नल रंजीत और विज्ञान के पहले सबक़


10 comments:

डा० अमर said...

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सो तो ठीक है, महाराज

पर 14 मार्च के बाद से लप्पूझन्ना पर ताला क्यों पड़ा हुआ है ?
लगे हाथ यह भी ख़ुलासा हो जाता, तो मन को संतोष मिलता ।
जरा आप बतायेंगे ?

महेन said...

भाषा का ठाठ बड़ा मज़ेदार है लपूझन्ना मेँ। पता नहीं संस्मरण हैं या मात्र कल्पना मगर जो भी हो मस्त है और मुनीश भाई आपकी आवाज़ में सुनकर मज़ा आ गया।

मुनीश ( munish ) said...

MOST RESPECTED JENAAB DOCTOR SAHEB AND BHAI MAHEN,

WHY ASHOK BHAI IS NOT GIVING ANY TAVAJJO TO THIS LOVELY BLOG(LAPUJHANNA) CAN BE BEST EXPLAINED BY HIM ONLY. I,HOWEVER, THANK U BOTH FOR SHARING MY LIKING FOR HIS BLOG AND I ALSO APPRECIATE UR TASTE FOR GOOD THINGS HAVING AN AESTHETIC APPEAL. IF U PEOPLE DON'T MIND A WEEKEND VISIT TO BAR, U ARE MOST WELCOME ANY SATURDAY OF THE YEAR.

Ashok Pande said...

शुक्रिया मुनीश भाई आपने लपूझन्ने को पोदीने के पेड़ पर चढ़ा दिया (अगर वो होता है तो). डॉक्टर साहेब, बहुत मसरूफ़ियत रही इन महीनों और मैं एक तरह से लपूझन्ने को भुला ही बैठा था. चलिये इस बहाने अब दोबारा इस पर काम करना चालू करता हूं. महेन भाई, कभी रामनगर शहर के खताड़ी मोहल्ले का चक्कर काट आवें, ये सारे कैरेक्टर आज भी अपनी पूरी शान में जीवित हैं. दुर्गादत्त मास्साब अलबत्ता पिछले बरस एक रोड एक्सीडेन्ट में गोलोकवासी हो गए. इसी महान नगर की घासमंडी में लालसिंह की खुट्टी मशीन बनाने की सफल वर्कशॉप है.

लपूझन्ना मेरा शुरुआती लड़कपन है जिसकी एक एक स्मृति जेहन में बहुत संभाल के साथ धरी हुई है.

सब का धन्यवाद!

नितिन बागला said...

लपूझन्ना मेरे भी पसंदीदा चिट्ठों में से है..गूगल फीड ले रखी है..पर जैसा कि अशोक जी ने बताया, कई दिनों से कुछ छपा नही वहां।
और हां "सुतरा" शब्द और लफत्तू के कुछ वाक्य जबान पर ऐसे चढे है कि कभी कभार प्रयोग में भी आ जाते है :)

Parul said...

bahut acchhey,,

joproductions said...

उम्दा पेशकश. मज़ा आया.

संजय जोशी

सतीश पंचम said...

भई ईतने अच्छे कन्टेंट वाले लपुझन्ना को यूं ही बेखबर मत छोडिए,...... अच्छा लिखा और अच्छी पेशकश के लिए आप लोगों को बधाई।

महेन said...

मुनीश भाई, आज ही ये पोस्ट दोबारा पड़ा तो टिप्पणियों पर भी नज़र पड़ी। बार में तो बार बार जाएं मगर मैं हूँ बंगलौर और आप जाने किस ठौर?
खैर, मुकालात तो अगर आप दिल्ली में हुए तो हो ही जाएगी।

अशोक भाई,
आज गाड़ी चलाते चलाते सोच रहा था कि आपसे पूछूँ कि लफ़त्तू और लालसिंह का क्या बना और खताड़ी मोहल्ला कब जाते हैं आप? रामनगर तो मेरे रास्ते में नहीं पड़ता, हां आपका नया ठिकाना हल्द्वानी मेरे अल्मोड़े के रास्ते ज़रूर पड़ता है। कार्बेट पार्क जाऊँगा तो आपको पकड़कर खताड़ी मोहल्ला के दर्शन भी कर आऊँगा। वैसे लगता है इस खताड़ी मोहल्ला का हो न हो कोई न कोई तार तो खत्याड़ी गांव से होगा जो मेरे गांव के पीछे ही है।

Sudarshan Angirash said...

Mahesh Ji,

Janha tak Bangalore ke Bar main aane ka sawaal hain to main agle hafte Bangalore aa raha hoon. Aasha hain aapse mulakaat hogi [sangirash(at)gmail(dot)com]. apna contact de dejiye main aapse contact ker loonga.

Aur Haan Ashok Da,
Sach main Lapujhanna ko bahut miss ker raha hoon. Apni nahi to hum readers ki khatir 15 din main ek aadh baar kuchh likh diya keejiye.
Padh ke waakai maja aata hain.

-- sudarshan